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तू ओम् का स्मरण कर।

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आज का विचार May 1, 2020 • आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार • Vaidik sidhant वैदिक सिन्द्धांत क्या आपने अभी तक वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब नहीं किया ?  तो अवश्य करें क्योंकि आप वेद,  वैदिक विज्ञान  वैदिक संदेश, वेद प्रवचन , राष्ट्रीय-  आत्मिक- सामाजिक आदि विषयों को सुनने से वंचित  रह जाएंगे । इसलिए  इन सभी विषयों को सुनने के लिए और आप अपनी  शंकाओं  का समाधान प्राप्त करने के लिए अवश्य ही - आज ही- अभी ही वैदिक राष्ट्र युटुब चैनल 👉सब्सक्राइब करें। 👍लाइक करें । 🔔बेल की घंटी को अवश्य दबाएं  धन्यवाद  है क्रतु! तू ओम् का स्मरण कर। जीवात्मा तू ओम का स्मरण कर । यह वैदिक विचार आज आप सुन रहे हैं जीवात्मा को क्रतु कहा गया है । जीवात्मा को कहा गया है -- है जीवात्मा तू ओम का स्मरण कर-- यजुर्वेद के 40 वें अध्याय में यह मंत्र है । अधिक जानकारी के लिए आप वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। धन्यवाद        | इस लिंक पर जायें,वैदिक राष्ट्र चैनल सब्क्राइब करें। लाईक करें। कमेंट करें। आचार्य भानु प्रताप वे...

जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

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जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना [ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने से मनुष्य ऐश्वर्यशाली बनता है। आज नौजवान ब्रह्मचर्य के व्रत को भूलकर भोगवाद की ओर भाग रहे हैं। ब्रह्मचर्य के अभाव में मनुष्य शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति से वंचित हो रहा है। आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध विद्वान् स्व० पं० बुद्धदेव विद्यालंकार जी (स्वामी समर्पणानन्द जी) का यह लेख 'आर्य गजट' हिन्दी (मासिक) के मार्च १९७४ के अंक में प्रकाशित हुआ था। ब्रह्मचर्य की शक्ति को जानने के लिए नौजवानों यह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए।  मूर्ख और बुद्धिमान में बड़ा अन्तर होता है। मूर्ख अच्छी बात को भी बुरा बना लेता है और बुद्धिमान बुरी चीज को भी अच्छी बना लेता है। काजल का अगर सही प्रयोग किया जाये तो आंखों में डाला हुआ सुन्दरता को चार चांद लगा देता है मगर गलत ढंग से प्रयोग किया हुआ वही काजल इधर-उधर लग जाये तो अच्छी सूरत को भी भद्दा बना देता है। एक बुद्धिमान पुरुष ने आग पर चढ़ी हुई देगची को देखा, उसने अनुभव किया कि वो पानी जो पहले चुपचाप था भाप बनकर कितना जबरदस्त बन गया है जिसने ढक्कन को धकेल कर फे...

मनुष्य जनम अनमोल रे भजन 

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मनुष्य जनम अनमोल रे भजन 

धैर्य के धनी स्वामी दयानन्द

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 धैर्य के धनी स्वामी दयानन्द  धैर्य के धनी स्वामी दयानन्द  लाहौर से स्वामी दयानन्द जी महाराज अमृतसर पधारे और सरदार भगवानसिंह के मकान में ठहरे। पण्डितों ने इस बार विरोध किया अपने चेलों सहित शास्त्रार्थ करने के लिए आए और अकड़ कर स्वामी जी के सम्मुख बैठ गये शास्त्रार्थ तो उन्हें क्या करना था, चेलों ने ईट पत्थर फेंकने आरम्भ कर दिये। सभा--स्थान को धूलि-वर्षा से धूसरित बना दिया। महाराज के इस अपमान को देखकर भक्तजन कपित हो उठे। उन्हें शान्त करते हुए स्वामी जी ने कहा- 'मत्त-मदिरा से उन्मत्त जनों पर कोप नहीं करना चाहिए। हमारा काम वैध का है। उन्मत्त मनुष्य को वैद्य औषध देता है निश्चय जानिये आज जो लोग मुझ पर इंट, पत्थर और धूल बरसाते हैं वही लोग पछता कर कभी पुष्प-वर्षा करने लग जायेगे।  स्वामी जी सच में अद्भुत धैर्य के धनी थे। इस तथ्य पर उनके जीवन से सम्बन्धित एक और घटना अच्छा प्रकाश डालती कार्तिक अमावस्या (३० अक्टूबर) का दिन था। डा० लक्ष्मणदास ने महाराज के जीवन की सब आशाएँ छोड़ने के साथ-साथ भक्तजनों से अनुरोध किया कि किसी अन्य सुयोग्य डाक्टर को भी महाराज को दिखाने ...

मातृभूमि प्रेम

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मातृभूमि प्रेम April 27, 2020 • आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार • कविता-काव्य -पद्य-गजल-छंद-व्यंग्य-मुक्तक-साहित्य                                                                      मातृभूमि प्रेम जापान का एक चित्रकार भगवान बुद्ध के जीवन के अनूठे प्रसंगों को अपनी तूलिका से चित्रित करने के उद्देश्य सारनाथ आया हुआ था। वह बुद्ध के प्रसंगों को दीवारों पर अंकित करने के कार्य में दिन भर मनोयोग से जुटा रहता रात के समय  बटलोई में कुछ चावल, दाल और आलू डालकर अपने लिए खिचड़ी बना लेता एक दिन एक बौद्ध ने उसे एक डिब्बे में से चावल के कुछ दाने निकालकर चावलों में मिलाते हुए देखा । उसने पूछा, 'क्या चावल इन दानों में कोई विशेषता है, जो तुमने डिब्बे में निकालकर मिलाए चित्रकार ने उत्तर दिया, 'बंधु चावल के ये दाने मेरे देश जापान में उपजे हैं। मैं इन्हें मातृभूमि का पवित्र प्रसाद मानकर प्रतिदिन अपने ...

यम-नियम

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यम-नियम April 19, 2020 • स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती  • Vaidik sidhant वैदिक सिन्द्धांत साभार -धर्म शिक्षा  लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती  यम-नियम - परमात्मा की प्राप्ति का साधन है  महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में अष्टाङ्गयोग (योग के आत अडों) का वर्णन किया है। उनमें प्रारम्भ के दो अङ्ग यम और नियम हैं। ये दोनों अङ्ग दिव्य मानव जीवन आवश्यक हैं,  अतः उनका वर्णन यहाँ दिया जा रहा हे  यम पाँच हैं  १. अहिंसा -मन, वचन, कर्म से किसी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना २.  सत्य-मन,  वचन, कर्म से सत्य का पालन करना। ३.  अस्तेय -चोरी न करना। बिना स्वामी आज्ञा के किसी पदार्थ को न उठाना। ४ . ब्रह्मचर्य- ईश्वर में विचरण करना, वेदअध्ययन करना, ज्ञानोपार्जन और वीर्य की रक्षा करना ५ . अपरिग्रह -अभिमानी न होना और पदार्थों का आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। नियम भी पाँच हैं १.  शौच -बाहर और भीतर की पवित्रता रखना। २.  सन्तोष -अपनी शक्ति के अनुसार प्रबल पुरुषार्थ करना और उस पुरुषार्थ से जो फल मिले उसमें सन्...

उपदेश_शिक्षा किसे देवें ,चाणक्य नीति

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उपदेश_शिक्षा किसे देवें ,चाणक्य नीति साभार -चाणक्य नीति दर्पण  भाष्यकार -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती          उपदेश_शिक्षा  किसे देवें। , चाणक्य_नीति, chankya_niti , vaidik_rashtra you tube chhanel subscribe kare you tube link = https://youtu.be/FtjU1gTC5i0     तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया। येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥३॥ शब्दार्थ-अहम मैं लोकानाम् मानवमात्र की हितकाम्यया कल्याण की कामना से, लोगों के भले के लिए तत उस 'राजनीतिसमुच्चयः' का  सम्प्रवक्ष्यामि सम्मक, ठीक-ठोक प्रवचन करूंगा, येन जिसके ,विज्ञानमात्रण ज्ञानमात्र से मनुष्य सर्वज्ञत्वम् सर्वज्ञता को रखते प्राप्त हो जाता है।  भावार्थ   -मैं लोगों के मङ्गल की इच्छा से उन राजनीतिसमुच्चर का वर्णन करूंगा, जिसको जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है विमर्श-सर्वज्ञ का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्यत् को जाता हो जाना अथवा सारे लोक-लोकान्तरों का ज्ञान प्राप्त हो जाना या  सब-कुछ जानने में समर्थ हो जाना ...