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Why Vedic Dharma is superior in the world?

Why Vedic Dharma is superior in the world? This question is necessary to be understood since the world is presently under the grip of so many religions. These religions pride themselves as best before a common man but in truth, and in order to justify their self interests shamelessly dish out half truths and falsehoods. They teach that there would be peace and prosperity only if the world were to follow them. However contrary to this position Vedic Dharma which has been upheld by the learned and wise for ages is highly rational and also in total conformity with the truth. Hence, so long the world does not care to follow the principles of Vedic Dharma; surely there would be no peace in the world. Then what are those special features that distinguish it from the other religions? The plain truth is no religion could stand before Vedic Dharma in terms of its greatness. Following are the great principles that characterise the Vedic Dharma. Study and decide yourselves. 1. It is based ...

स्वामी हीरानन्द बेधड़क

स्वामी हीरानन्द बेधड़क                                 डा.अशोक आर्य      आर्यजन तथा आर्य समाज अपने उन भजनोपदेश्कों का सदा ही riniऋणी रहेगा, जिन्होंने नींव के पत्थर बन कर आर्य समाज की सेवा की| आरम्भ में तो भजनोपदेशक का कार्य आने वाले प्रवक्ता के लिए भीड़ जुटाना मात्र ही होता था किन्तु आज भाजनोपदेशकों ने अपनी अथक मेहनत से स्वयं को आर्य समाज के प्रचार और वैदिक सिद्धांतों के प्रसार का साधन बना लिया है| इस कारण आज आर्य समाज में भाज्नोपदेश्कों का भी विशेष सथान हो गया है| इस प्रकार के भजनोपदेशकों में स्वामी हीरानंद बेधड़क जी भी एक रहे हैं|     स्वामी जी ने जिस उत्तम ढंग से अपने उच्चकोटि के भजनों के माध्यम से आर्य समाज की जो सेवा की, उसके लिए आर्य समाज सदा उनका ऋणी रहेगा| स्वामी जी ने कभी भी स्वयं को देश, जाति और आर्य समाज से ऊपर नहीं समझा अपितु स्वयं को सदा ही इन सब का सेवक बनाए रखा| यह ही कारण था कि भारतीय  स्वाधीनता संग्राम में देिहित को सर्वोपरी मानते हुए आप आठ बार जेल गए| जब कांग...

“योगेश्वर कृष्ण अद्वितीय महापुरुष थे जिनका जीवन एवं कार्य अनुकरणीय है”

आगामी कृष्ण जन्माष्टी पर्व दिनांक 12 अगस्त, 2010 पर- “योगेश्वर कृष्ण अद्वितीय महापुरुष थे जिनका जीवन एवं कार्य अनुकरणीय है” ============= मनुष्य का जन्म आत्मा की उन्नति के लिये होता है। आत्मा की उन्नति में गौण रूप से शारीरिक उन्नति भी सम्मिलित है। यदि शरीर पुष्ट और बलवान न हो तो आत्मा की उन्नति नहीं हो सकती। आत्मा के अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार यह चार अवयव व उपकरण होते हैं। इनकी उन्नति भी आत्मा की उन्नति के लिये आवश्यक है। समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर निष्कर्ष निकलता है कि वेदज्ञान से मनुष्य ईश्वर, आत्मा व सांसारिक ज्ञान को प्राप्त होकर तथा तदनुकूल आचरण करने से उसकी शारीरकि, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति होती है। श्री कृष्ण जी सच्चे वेदानुयायी एवं ईश्वरभक्त थे। वह सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञ नहीं थे अपितु माता-पिता से जन्म होने तथा शरीर छोड़ने के कारण वेद सिद्धान्तों के अनुसार वह श्रेष्ठ व ऋषियों के समान जीवात्मा होना ही निश्चित होता है। श्री कृष्ण जी का जीवन संसार के सभी लोगों के लिये प्रेरणादायक एवं अनुकरणीय है। उनके जीवन, कार्यों एवं शिक्षाओं का अध्ययन करने एवं उनके...

ईश्वर और वेद ही संसार में सच्चे अमृत हैं”

ईश्वर और वेद ही संसार में सच्चे अमृत हैं” =========== संसार में तीन सनातन, अनादि, अविनाशी, नित्य व अमर सत्तायें हैं। यह हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। अमृत उसे कहते हैं जिसकी मृत्यु न हो तथा जिसमें दुःख लेशमात्र न हों और आनन्द भरपूर हो। ईश्वर अजन्मा अर्थात् जन्म-मरण धर्म से रहित है। अतः ईश्वर मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने के कारण अमृत है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप होने से सदैव आनन्द से पूर्ण रहता है। प्रकृति में विकार होकर कार्य सृष्टि का निर्माण होता है और इसकी समयावधि पूर्ण होने पर यह प्रलय को प्राप्त हो जाती है। प्रकृति जड़ होने के कारण इस पर अमृत और विकारों का सुख व दुःखरूपी प्रभाव नहीं होता। जीवात्मा अनादि, अनन्त, अविनाशी, अमर, अजर, नित्य, जन्म-मरण धर्मा, पाप-पुण्य कर्मों का कर्ता और कर्मों के कारण बन्धनों में फंसता है। बन्धनों में फंसा तथा सुख-दुःखों को भोगने वाला जीवात्मा तब तक अमृत नहीं कहला सकता जब तक कि इसका जन्म व मरण का बन्धन दीर्घकाल की अवधि के लिये भंग न हो। क्या ऐसा हो सकता है? इसका उत्तर है कि यह अवश्य हो सकता है। इस विषय को वैदिक धर्म विषयक प्रामाणिक शास्त्रों एवं सत्यार्थ...

सबसे बड़ा गुरु कौन

सबसे बड़ा गुरु कौन (आज गुरु पूर्णिमा पर विशेष) डॉ विवेक आर्य आज गुरु पूर्णिमा हैं। हिन्दू समाज में आज के दिन तथाकथित गुरु लोगों की लॉटरी लग जाती हैं। सभी तथाकथित गुरुओं के चेले अपने अपने गुरुओं के मठों, आश्रमों, गद्दियों पर पहुँच कर उनके दर्शन करने की हौड़ में लग जाते हैं। खूब दान, मान एकत्र हो जाता हैं। ऐसा लगता हैं की यह दिन गुरुओं ने अपनी प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्द किया हैं। भक्तों को यह विश्वास हैं की इस दिन गुरु के दर्शन करने से उनके जीवन का कल्याण होगा। अगर ऐसा हैं तब तो इस जगत के सबसे बड़े गुरु के दर्शन करने से सबसे अधिक लाभ होना चाहिए। मगर शायद ही किसी भक्त ने यह सोचा होगा की इस जगत का सबसे बड़ा गुरु कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें योग दर्शन में मिलता हैं। स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् || ( योगदर्शन : 1-26 ) वह परमेश्वर कालद्वारा नष्ट न होने के कारण पूर्व ऋषि-महर्षियों का भी गुरु है । अर्थात ईश्वर गुरुओं का भी गुरु हैं। अब दूसरी शंका यह आती हैं की क्या सबसे बड़े गुरु को केवल गुरु पूर्णिमा के दिन स्मरण करना चाहिए। इसका स्पष्ट उत्तर हैं की नहीं ईश्वर को सदैव स्मरण...

ध्यान संध्या करना ही ईश्वर की सच्ची उपासना है -

ध्यान संध्या करना ही ईश्वर की सच्ची उपासना है - भगवान कण कण में है परन्तु कण कण भगवान नहीं है । मूर्ति को भगवान मान कर पूजते हो तो तो घर में पड़ी मेज कुर्सी को भगवान मान कर क्यों नहीं पूजते ? उनको भोग क्यों नहीं लगाते ? घासफूस, मलमूत्र आदि में भी भगवान है उनको क्यों नहीं पूजते ? कुछ लोग कुतर्क करते हैं कि मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले अपने माता पिता की फोटो पर थूक कर दिखायें । ऐसे लोगों को इतनी भी समझ नहीं कि कहीं भी थूकना मूर्खता है, असभ्यता है । माता पिता व महापुरषों के चित्र मात्र स्मृति चिह्न हैं, उनको घरों में लगाने का इतना ही उद्देश्य है कि उनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती रहे । यदि कोई उनको भगवान मान कर भोग लगायेगा, सुबह शाम उनकी आरती उतारेगा, उनमें प्राण प्रतिष्ठा का ढोंग करेगा तो वह मूर्ख है । माता पिता व महापुरुषों के चित्र तो वास्तविक हैं परन्तु तुम्हारे देवी देवताओं व भगवानों के चित्र तो काल्पनिक हैं । कण कण में व्याप्त परमात्मा का तो कोई चित्र वा कोई मूर्ति हो ही नहीं सकती । चार मुख वाला ब्रह्मा, हाथी के सिर वाला गणेश, अजीब से शक्ल वाला महाकाल, भग लिंग का प्रतीक शिवलिंग...

गुरु ग्रन्थ साहब बनाम वेद -

गुरु ग्रन्थ साहब बनाम वेद - ................................... 1.ओंकार वेद निरमए (राग रामकली महला १,ओंकार शब्द १)        अर्थात् ओंकार ईश्वर ने वेद बनाए । 2. हरि आज्ञा होए, वेद पाप पुन्न विचारिआ( मारू डखणे, महला 5, शब्द-१) अर्थात् ईश्वर की आज्ञा से वेद हुए जिससे मनुष्य पाप-पुण्य का विचार कर सके। 3.सामवेद, ऋग जजुर अथर्वण. ब्रह्मे मुख माइया है त्रैगुण. ताकी कीमत कीत,कह न सकै को तिउ बोलै जिउ बोलाइदा(. – मारू सोलहे महला-१, शब्द-१७) अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद परमात्मा की वाणी है. इनकी कीमत कोई नहीं बता सकता. वे अमूल्य और अनन्त हैं। 4. ओंकार उत्पाती. किया दिवस सभ राती वन तृण त्रिभवन पाणी.चार वेद चारे खानी (राग मारू महला-5, शब्द-१७) अर्थात् ओंकार (परमात्मा) ने ही दिन-रात, वन, घास, तीनों लोक, पानी आदि को बनाया और उसी ने चारों वेदों को बनाया, जो चार खानों (कोषों) के समान हैं। 5. वेद बखान कहहि इक कहिये. ओह बेअन्त अन्त किन् लहिये । दिवा तले अँधेरा जाई. वेदपाठ मति पापा खाई.उगवै सूर न जापै चन्द, जहाँ ज्ञान प्रकाश अज्ञान मिटन्त.(वसन्त अष्टपदियाँ महला-१,...