#ब्रह्मयज्ञ (वैदिक संध्या) ओ३म् वरदान केयर

#ब्रह्मयज्ञ (वैदिक संध्या) ओ३म् वरदान केयर

भारतीय सनातन वैदिक परम्परा मे पंच यज्ञों का विशेष महत्व है...

जो कि प्रत्येक गृहस्थ के लिये अनिवार्य हैं....
(१) ब्रह्मयज्ञ :-

ब्रह्मयज्ञ संध्या को कहते है। प्रात: सूर्योदय से पूर्व तथा सायं सूर्यास्त के बाद जब आकाश में लालिमा होती है,...
तब एकांत स्थान में बैठ कर ईश्वर का ध्यान करना ही ब्रह्मयज्ञ या संध्या (sandhya) कहलाती है।

(२) देवयज्ञ :-

अग्निहोत्र अर्थात हवन को देवयज्ञ कहते है। यह प्रतिदिन इसलिए करना चाहिए..... क्योंकि हम दिनभर अपने शरीर के द्वारा वायु, जल और पृथ्वी को प्रदूषित करते रहते है। इसके अतिरिक्त आजकल हमारे भौतिक साधनों से भी प्रदूषण फैल रहा है,....
जिसके कारण अनेक बीमारियाँ फैल रही है। उस प्रदूषण को रोकना तथा वायु, जल और पृथ्वी को पवित्र करना हमारा परम कर्तव्य है।...
सब प्रकार के प्रदूषण को रोकने का एक ही मुख्य साधन है और वो है हवन। अनुसंधानों के आधार पर एक बार हवन करने से 8 किलोमीटर तक की वायु शुद्ध होती है ।

(३) पितृयज्ञ :-

जीवित माता- पिता तथा गुरुजनों और अन्य बड़ों की सेवा एवं आज्ञापालन करना ही पितृयज्ञ है।

(४) अतिथियज्ञ :-

 घर पर आए हुए अतिथि, विद्वान, धर्मात्मा, संत- महात्माओं का भोजन आदि से सत्कार करके उनसे
ज्ञानप्राप्ति करना ही अतिथियज्ञ कहलाता है।

(५) बलिवैश्वदेवयज्ञ :-

पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए ही बनाए हैं। इनपर दया करना और इन्हें खाना खिलाना बलिवैश्वदेवयज्ञ कहलता है।
इसकी परम्परा तो कुछ वर्ष पूर्व सम्भवतः सभी के घर परिवार मे हुआ करती थी...
माताएं भोजन बनाने के पश्चात भोजन का थोड़ा सा हिस्सा जीव जन्तुओं के लिये रखा करती थीं ‌‌‌...
किन्तु अब धीरे धीरे जो भी परम्पराएं थीं वो विलुप्त सी होने लगी हैं...

ब्रह्म यज्ञ परिचय

वैदिक संध्या पूर्णत वैज्ञानिक और प्राचीन काल से चली आ रही हैं। यह ऋषि-मुनियों के अनुभव पर आधारित हैं वैदिक संध्या की विधि से उसके प्रयोजन पर प्रकाश पड़ता है। मनुष्य में शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित और अहंकार स्थित हैं।

आर्य समाज की स्थापना से बहुत पूर्व जब से यह जगत् रचा गया है , तब से ही इस जगत् में संध्या करने की परम्परा अनवरत रूप से चल रही है ।
बीच में एक युग एसा आया जब वेद धर्म से विमुख हो कर कार्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ तो संध्या को भी लोग भुलाने लगे किन्तु स्वामी दयानंद सरस्वती जी का हम पर महान् उपकार है , जो हम पुन: वेद धर्म के अनुगामी बने तथा संध्या से न केवल परिचित ही हुए अपितु संध्या करने भी लगे।

संध्या का अर्थ

सृष्टि क्रम में एक निर्धारित समय पर परम पिता परमात्मा का चिंतन करना ही संध्या कहलाता है। ब्रह्मयज्ञ में हम ईश्वर का ध्यान कर उनके प्रति कृतज्ञता के भाव को प्रबल करते हुए अपने मन को उस निराकार , चेतन,सर्व व्यापक शक्ति में स्थित करते हैं।

इससे स्पष्ट है कि दिन के एक निर्धारित काल में जब हम अपने प्रभु को याद करते हैं , उसका गुणगान करते हैं , उसके समीप बैठ कर उसका कुछ स्मरण करते हैं , बस इस का नाम ही संध्यआ

संध्या का समय

 एक निश्चित समय पर प्रभु स्मरण करना ही संध्या है ।यह निश्चित समय कालक्रम से सृष्टि बनाते समय ही प्रभु ने निश्चित कर दिया था ।यह समय है संधि काल। संधिकाल से अभिप्राय: है जिस समय दिन व रात का मिलन होता है तथा जिस समय रात और दिन का मिलन होता है , उस समय को संधि काल कहते हैं ।
इस से स्पष्ट होता है कि प्रात: के समय जब आकाश मे हल्के हल्के तारे दिखाई दे रहे हों, सूर्य निकलने की तैयारी में हो , इस समय को हम प्रात:कालीन संध्या काल कहते हैं । प्रात:काल का यह समय संध्या का समय माना गया है | इस समय ही संध्या का करना उपयोगी है ।ठीक इस प्रकार ही सायं के समय जब दिन और रात्री का मिलन होने वाला होता है , सूर्य अस्ताचाल की और गमन कर रहा होता है किन्तु अभी तक आधा ही अस्त हुआ होता है ।आकाश लालिमा से भर जाता है । इस समय को हम सायं कालीन संध्या समय के नाम से जानते हैं ।सायं कालीन संध्या के लिए यह समय ही माना गया है । इस समय ही संध्या के आसन पर बैठ कर हमें संध्या करना चाहिए।

संध्या का महत्व

वैदिक संध्या में आचमन मंत्र से शरीर, इन्द्रिय स्पर्श और मार्जन मंत्र से इन्द्रियाँ, प्राणायाम मंत्र से मन, अघमर्षण मंत्र से बुद्धि, मनसा-परिक्रमा मंत्र से चित और उपस्थान मंत्र से अहंकार को सुस्थिति संपादन किया जाता है। फिर गायत्री मंत्र द्वारा ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना की जाती हैं। अंत में ईश्वर को नमस्कार किया जाता हैं। यह पूर्णत वैज्ञानिक विधि हैं जिससे व्यक्ति धार्मिक और सदाचारी बनता हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करता हैं।
हमें प्रात: व सायं मन, वचन और कर्म से पवित्र होकर संध्योपासना करनी चाहिए | प्रात: काल पूर्व की ओर मुख करके और सायं काल पश्चिम की ओर मुख करके संध्या करनी चाहिए |

संध्या की प्रायोगिक आवश्यकता

संध्या के लिए बताया गया है कि हम प्रतिदिन दो काल स्नान करके अपने शरीर को शुद्ध करें।
अपने अन्तः करण को शुद्ध करने के लिए राग, द्वेष, असत्य आदि दुरितों को त्याग दें ।
कुशा व हाथ से मार्जन करें।
 ओ३म् का उच्चारण करते हुए तीन बार लंबा श्वास लें तथा छोड़ें , यह प्राणायाम है ।
सब से अंत में गायत्री का गायन करते हुए शिखा को बांधें ।
इस प्रकार यह पांच क्रियाएं करके मन व आत्मा को शांत स्थिति में लाया जावे।

संध्या के छः अनुष्ठान

यह शांत स्थिति बनाने के पश्चात् संध्या के लिए छ: अनुष्ठान किया जावें ,जो इस प्रकार हैं :

१. शरीर को असत्य से दूर

 शरीर को असत्य से दूर करने के लिए संध्या में बताये गए प्रथम मन्त्र ओ३म् शन्नो देवी रभिष्टये आपो भवन्तु पीतये शंयो राभिस्रवंतु न: का उच्चारण करने के पश्चात् तीन आचमन करें ।

२. मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि

 ओ३म् वाक् वाक् ओ३म प्राण: प्राण: आदि मन्त्र से अंगों की शुद्धि करें । ओ३म भू: पुनातु शिरसि आदि मन्त्र से प्रभु के नामों का अर्थ करते हुए मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि करें ।

३. प्राणायाम से मन शांत

कम से कम तीन तथा अधिक से अधिक ग्यारह प्राणायाम कर अपने मन को शांत करें ।

४. बुद्धि की शुद्धि तथा बोले मन्त्रों के अर्थ चिंतन

ओ३म् ऋतं च आदि इन तीन मन्त्रों से अपनी बुद्धि को समझाते हुए शुद्ध करें तथा पुन: शन्नो देवी मन्त्र को बोलते हुए अब तक जो मन्त्र हमने बोले हैं , उन सब के अर्थ को देखें तथा अर्थों पर चिंतन करें ।

५. चित को सुव्यवस्थित करें

ओ३म् प्राची दिग अग्नि आदि इन छ: मन्त्रों का गायन करते हुए अपने चित को सुव्यवस्थित करें ।

६. अहंकार तत्व

ओ३म् उद्वयं से ले कर ताच्च्क्शुर्देवहितं तक के मंत्रों का गायन करते हुए अहंकार तत्व से अपनी स्थिति का सम्पादन करें ।

 प्रधान जप यह छ: अनुष्ठान करने के पश्चात् हम इस स्थिति में आ जाते हैं की अब हम प्रधान जप अर्थात गायत्री का जाप कर सकें ।
अत: अब हम गायत्री का जप करते हैं ।

समर्पण

गायत्री का जप करते हुए हम स्वयं को उस परमात्मा, परमपिता, परमेश्वर के पास पूरी तरह से समर्पित करने के लिए बोलते हैं , हे इश्वर दयानिधे भवत्क्रिप्यानेण जपोपास्नादि कर्मणा धर्मार्थ का मोक्षानाम सद्यसिद्धिर्भवेण ।इस प्रकार हम समग्रतया उस प्रभु को समर्पित हो जाते हैं ।

 नमस्कार

अंत में हम उस परमात्मा को नमस्ते करते हुए अपने आज के कर्तव्य को पूर्ण करते हुए संध्या का यह अनुष्ठान पूर्ण करते हैं ।


ब्रह्मयज्ञ के मंत्र व विधि

|| गायत्री मन्त्र ||

मंत्र

ओ३म् भूर्भुव: स्व:,
तत्सवितुर्वरेण्यं ।
भर्गो देवस्य धीमहि ,
धियो यो न: प्रचोदयात् ।।
                              यजुर्वेद ३६.३


अर्थ

तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू |
तुझ से ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता है तू ||
तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान |
सृष्टि की वस्तु वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ||
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया |
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ||

|| अथ आचमन मन्त्र ||*ओ३म् सर्वज्ञ
वेद वरदान आर्य©

निम्न मन्त्र से दायें हाथ में जल ले कर तीन बार आचमन करें |

मंत्र

ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभिस्रवन्तु नः॥
                                    यजु. ३६.१२

अर्थ

सर्वप्रकाशक और सर्वव्यापक ईश्वर इच्छित फल और आनंद प्राप्ति के लिए हमारे लिए कल्याणकारी हो और हम पर सुख की वृष्टि करे।

(तीन प्रकार की शांति के लिए आचमन भी तीन बार किया जाता है| पहला आचमन अध्यात्मिक शांति के लिए। दूसरा आधि-भौतिक शांति के लिए और तीसरा आचमन आधि-दैविक शांति के लिए)

|| अथ इन्द्रिय स्पर्श ||

अब बायें हाथ में जल ले कर दायें हाथ की अनामिका व मध्यमा उंगलियों से इन्द्रिय स्पर्श करे | ऐसा करते समय ईश्वर से इन्द्रियों में बल व ओज की प्रार्थना करनी चाहिए ।

मंत्र

ओ३म्‌ वाक् वाक्,
ओ३म्‌ प्राण: प्राण:,
ओ३म्‌ चक्षुश्चक्षु:,
ओ३म्‌ श्रोत्रम् श्रोत्रम्,
ओ३म्‌ नाभि:,
ओ३म्‌ हृदयम,
ओ३म्‌ कंठ:,
ओ३म्‌ शिर:,
ओ३म्‌ बाहुभ्यां यशोबलं,
ओ३म्‌ करतल करप्रष्ठे |

अर्थ

हे ईश्वर! मेरी वाणी, प्राण, आंख, कान, नाभि, हृदय, कंठ, शिर, बाहु और हाथ के ऊपर और नीचे के भाग (अर्थात) सभी इन्द्रिया बलवान और यश्वाले हो|

|| मार्जन मन्त्र ||वरदान

मंत्र

ओ३म्‌ भू: पुनातु शिरसि,
ओ३म्‌ भुव: पुनातु नेत्रयो:,
ओ३म्‌ स्व: पुनातु कण्ठे,
ओ३म्‌ मह: पुनातु हृदये,
ओ३म्‌ जन: पुनातु नाभ्यां,
ओ३म्‌ तप: पुनातु पादयो:,
ओ३म्‌ सत्यम पुनातु पुन: शिरसि,
ओ३म्‌ खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र |

अर्थ

हे ईश्वर! आप मेरे शिर, नेत्र, कंठ, हृदय, नाभि, पैर अर्थात समस्त शरीर को पवित्र करे |

|| अथ प्राणायाम मन्त्र ||

इस मन्त्र से तीन बार प्राणायाम करे |

मंत्र

ओ३म्‌ भू: | ओ३म्‌ भुव: | ओ३म्‌ स्व: | ओ३म्‌ मह: | ओ३म्‌ जन: | ओ३म्‌ तप: | ओ३म्‌ सत्यम |

प्राणायाम विधि :

१. पद्मासन या किसी अन्य आसन से, जिससे सुखपूर्वक उस समय तक बिना आसन बदले बैठ सके, जितनी देर प्राणायाम करना इष्ट हो, इस प्रकार बैठ जाये कि छाती, गला और मस्तक तीनो एक सीध में रहे |

२. नाक से धीरे धीरे श्वास बाहर निकले (रेचक) और उसे बाहर ही रोक दे (बाह्य कुम्भक) | ऐसा करते समय मूलेंद्रिय (गुदा इन्द्रिय) को ऊपर की ओर संकुचित करना चाहिए | यदि प्रारम्भ में मूलेंद्रिय का संकोच न हो सके तो कोई चिंता नहीं करनी चाहिए |

३. जब और अधिक देर बिना श्वास लिए न रह सके तो धीरे धीरे श्वास भीतर खीचे (पूरक) और उसे भीतर ही रोक दे (आभ्यन्तरकुम्भक)
४. जब और अधिक समय भीतर श्वास न रोक सके तो फिर से स० (२) के अनुसार रेचक करे|

५. प्रत्येक क्रिया के साथ प्राणायाम मन्त्र का मानसिक जप करे|

|| अथ अघमर्षण मंत्रा: ||

मंत्र

ओ३म्‌ ऋतंच सत्यंचा भीद्धात्तपसोध्य्जायत |
ततो रात्र्यजायत तत: समुद्रो अर्णव: ||

ओ३म्‌ समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत |
अहो रात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ||

ओ३म्‌  सूर्याचन्द्र्मसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् |
दिवंच प्रथिवीन्चान्तरिक्षमथो स्व: ||

अर्थ

हे ईश्वर, इस संसार में जितने भी ऋतु व सत्य पदार्थ है सब आपके बनाए हुए है | आप ही सूर्य चन्द्र आदि नक्षत्रो को अनादि काल से बना कर धारण कर रहे है |

|| अथ आचमन मन्त्र ||

इस मन्त्र से पुन: तीन बार आचमन करें |

मंत्र

ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये । शंयोरभिस्रवन्तु नः॥
                                       यजु. ३६.१२

अर्थ

सर्वप्रकाशक और सर्वव्यापक ईश्वर इच्छित फल और आनंद प्राप्ति के लिए हमारे लिए कल्याणकारी हो और हम पर सुख की वृष्टि करे|

|| अथ मनसा परिक्रमा मन्त्र ||

मंत्र

ओ३म्‌ प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः|
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु|
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥
                                                अथर्ववेद ३/२७/१

ओ३म्‌ दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः|
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु|
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।।
                                                 अथर्ववेद ३/२७/२

ओ३म्‌ प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।।
                                                 अथर्ववेद ३/२७/३

ओ३म्‌ उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताऽशनिरिषवः।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।।
                                                अथर्ववेद ३/२७/४

ओ३म्‌ ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।।
                                              अथर्ववेद ३/२७/५

ओ३म्‌ ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।।
                                             अथर्ववेद ३ /२७/ ६

अर्थ

हे पावन परमेश्वर ! आप प्राची, प्रतीची आदि समस्त दिशाओं में विध्यमान हो कर हम सब की रक्षा करते है | हम आपके रक्षक स्वरुप को बार बार प्रणाम करते है तथा द्वेष भाव को आपकी न्याय व्यवस्था में समर्पित करते है |

 || उपस्थान मंत्र ||

मंत्र

ओ३म्‌ उद्वयन्तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् |
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ||
                                                 यजुर्वेद ३५/१४
                                 
ओ३म्‌ उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः |
दृशे विश्वाय सूर्यम् ||
                                                यजुर्वेद ३३/३१

ओ३म्‌ चित्रं देवानामुद्गादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः |
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम् सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ||
                                               यजुर्वेद ७/४२

ओ३म्‌ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् |
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम् शृणुयाम शरदः
शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं
भूयश्च शरदः शतात् ||
                                              यजुर्वेद ३६/१४

अर्थ

हे पिता ! आपकी दया से हम अज्ञान अन्धकार से ज्ञान व प्रकाश की ओर बढ़े तथा समस्त इन्द्रियों से भद्र आचरण करते हुए तथा आपका स्मरण करते हुए सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीवन यापन करे |

|| गायत्री मंत्र ||

मंत्र

ओ३म् भूर्भुव: स्व:,
तत्सवितुर्वरेण्यं ।
भर्गो देवस्य धीमहि,
धियो यो न: प्रचोदयात् ।।
                              यजुर्वेद, ३६/३, ऋग्वेद, ३/६२/१०

अर्थ

हे प्राणस्वरूप, दुःख विनाशक, स्वयं सुखस्वरूप और सुखो को देने वाले प्रभु हम आपके वर्णीय तेज स्वरुप का ध्यान करते है | आप कृपया करके हमारी बुद्धियो को सन्मार्ग में प्रेरित कीजिये |

|| अथ समर्पणम् ||

मंत्र

हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा
धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥

अर्थ

हे दयानिधान ! हम आपकी उपासना करते है | आप कृपया करके हमें शीघ्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराईये |

|| अथ नमस्कार मन्त्र ||

मंत्र

ओ३म् नमः शम्भवाय च मयोभवाय च |
नमः शंकराय च मयस्कराय च |
नमः शिवाय च शिवतराय च |
                                             यजुर्वेद ६/ ४१

अर्थ

हे सुख़ स्वरुप व सुख़ प्रदाता, कल्याणकारक, मंगलस्वरूप, मोक्ष को देने वाले पूज्य प्रभु, हम पुन: पुन: आपके शिव रूप को प्रणाम करते है ।


ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्र

मंत्र

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव|
यद भद्रं तन्न आ सुव ||
                                                     यजुर्वेद ३०.३

अर्थ

तू सर्वेश सकल सुखदाता शुध्दस्वरूप विधाता है|
उसके कष्ट नष्ट हो जाते जो तेरे ढिंग आता है||
सारे दुर्गुण दुर्व्यसनो से हमको नाथ बचा लीजिये|
मंगलमय गुणकर्म पदार्थ प्रेम सिन्धु हमको दीजिए ||

मंत्र

ओ३म् हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत |
 स दाधार प्रथिवीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ||
                                                    यजुर्वेद १३.४

अर्थ

तू ही स्वयं प्रकाश सुचेतन सुखस्वरूप शुभ त्राता है|
सूर्य चन्द्र लोकादि को तू रचता और टिकाता है||
पहले था अब भी तू ही है घट घट मे व्यापक स्वामी|
योग भक्ति तप द्वारा तुझको पावें हम अन्तर्यामी ||     

मंत्र

ओ३म् य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: ।
यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम ||
                                                 यजुर्वेद २५.१३

अर्थ

तू ही आत्म ज्ञान बल दाता सुयश विज्ञ जन गाते है |
तेरी चरण, शरण मे आकर भव सागर तर जाते है ||
तुझको ही जपना जीवन है मरण तुझे बिसराने मे |
मेरी सारी शक्ति लगे प्रभू तुझसे लगन लगाने में ||   

मंत्र

ओ३म् य: प्राणतो निमिषतो महित्वैक इन्द्राजा जगतो बभूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम ||     
                                                 यजुर्वेद २३.३

अर्थ

तुने अपने अनुपम माया से जग मे ज्योति जगायी है |
मनुज और पशुओ को रच कर निज महिमा प्रकटाई है ||
अपने हिय सिंहासन पर श्रद्धा से तुझे बिठाते है |
भक्ति भाव से भेंटे ले के तब चरणो मे आते है ||

ओ३म् येन द्यौरुग्रा पृथिवी च द्रढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम ||
                                               यजुर्वेद ३२.६

अर्थ

तारे रवि चन्द्रादि रच कर निज प्रकाश चमकाया है |
धरणी को धारण कर तूने कौशल अलख लखाया है ||
तू ही विश्व विधाता पोषक, तेरा ही हम ध्यान धरे |
शुद्ध भाव से भगवन तेरे भजनाम्रत का पान करे ||

मंत्र

ओ३म् प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तनो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ||
                                            ऋ्गवेद १०.१२१.१०


अर्थ

तुझसे भिन्न न कोई जग मे, सबमे तू ही समाया है |
जङ चेतन सब तेरी रचना, तुझमे आश्रय पाया है ||
हे सर्वोपरि विभो! विश्व का तूने साज सजाया है |
हेतु रहित अनुराग दीजिए यही भक्त को भाया है || 

मंत्र

ओ३म् स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।
यत्र देवा अमृतमानशाना स्तृतीये घामन्नध्यैरयन्त ||
                                           यजुर्वेद ३२.१०

अर्थ

तू गुरु है प्रदेश ऋतु है, पाप पुण्य फल दाता है |
तू ही सखा मम बंधु तू ही तुझसे ही सब नाता है ||
भक्तो को इस भव बन्धन से तू ही मुक्त कराता है |
तू है अज अद्वैत महाप्रभु सर्वकाल का ज्ञाता है ||

मंत्र

ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ||
                                          यजुर्वेद ४०.१६

अर्थ

तू है स्वयं प्रकाशरुप प्रभु सबका स्रजनहार तू ही |
रचना नित दिन रटे तुम्ही को मन मे बसना सदा तूही ||
अघ अनर्थ से हमें बचाते रहना हर दम दयानिधान |
अपने भक्त जनो को भगवन दीजिए यही विशद वरदान ||   

|| मंगल कामना ||

मंत्र

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्व सन्तु निरामय: |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कशिच्द् दु:ख्भाग्भावेत् ||

अर्थ

हे नाथ ! सब सुखी हो, कोई न हो दुखारी |
सब हो निरोग भगवन्, धन्य-धान्य के भण्डारी ||
सब भद्रभाव देखे, सन्मार्ग के पथी हो |
दुखिया न कोई होवे, सृष्टि में प्राणधारी ||

|| वैदिक प्रार्थना ||

पूज्यनीय प्रभो! हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए |
छोङ देवें छल कपट को, मानसिक बल दीजिए ||१||

वेद की गायें ऋचायें, सत्य को धारण करें |
हर्ष में हों मग्न सारे शोक-सागर से तरें ||२||

अश्वमेधादिक रचायें यज्य पर-उपकार को |
धर्म-मर्यादा चलाकर, लाभ दें संसार को ||३||

नित्य श्रद्धा-भक्ति से यज्यादि हम करते रहें |
रोग पीङित विश्व के सन्ताप सब हरते रहें ||४||

भावना मिट जाय मन से पाप अत्यचार की |
कामनायें पूर्ण होवें यज्य से नर नारि की ||५||

लाभकारी हो हवन हर प्राणधारी के लिये |
वायु-जल सर्वत्र हों शुभ गन्ध को धरण किये ||६||

स्वार्थ-भाव मिटे हमारा प्रेम-पथ विस्तार हो |
'इदन्न मम' का सार्थक प्रत्येक मे व्यवहार हो ||७||

हाथ जोङ झुकायें मस्तक वन्दना हम कर रहे |
'नाथ' करुणा-रूप करुणा आपकी सब पर रहे ||८||

|| संगठन सूक्त ||

मंत्र

ओ३म्‌ सं समिधु वसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ |
इडस्पदे समिध्यसे स नो वसुन्या भर |१|

अर्थ

हे प्रभो ! तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ||
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिए धन वृष्टि को ||

मंत्र

ओ३म सगंच्छध्वं सं वदध्वम् सं वो मनांसि जानतामं |
देवा भागं यथा पूर्वे सं जानानां उपासते |२|

अर्थ

प्रेम से मिल कर चलो बोलो सभी ज्ञानी बनो |
पूर्वजों की भांति तुम कर्त्तव्य के मानी बनो ||

मंत्र

समानो मन्त्र:समिति समानी समानं मन: सह चित्तमेषाम् |
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि |३|

अर्थ

हों विचार समान सब के चित्त मन सब एक हों |
ज्ञान देता हूँ बराबर भोग्य पा सब नेक हो ||

मंत्र

ओ३म समानी व आकूति: समाना हृदयानी व: |
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति |४|

अर्थ

हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा |
मन भरे हो प्रेम से जिससे बढे सुख सम्पदा ||

|| वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना ||

#मंत्र

आ ब्रह्मन्‌ ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् |
आराष्ट्रे राजन्यः शूरऽइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम् |
दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः |
सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् |
निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऽओषधयः |
पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्‌॥

                                                -यजु. २२.२२

#अर्थ

ब्रह्मन ! स्वराष्ट्र में हो द्विज ब्रह्म तेजधारी |
क्षत्रिय महारथी हों अरि-दल विनाशकारी ||

होवें दुधारू गोवें पशु अश्व आशुवाही |
आधार राष्ट्र की हों, नारी सुभग सदा ही ||

बलवान सभ्य योध्दा यजमान पुत्र होवें |
इच्छानुसार बरसे, पर्जन्य ताप धोवें ||

फल-फूल से लदी हों ओषध अमोघ सारी |
हो योगक्षेम-कारी, स्वाधीनता हमारी ||

|| अथ शांति मन्त्र ||

मंत्र

ओ३म् द्यौ शान्तिरन्तरिक्षं शांतिः पृथ्वी शान्तिरापः शांतिः रोषधयः शांतिः |
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवः शांतिर्ब्रह्मशांति सर्व शांतिः शान्तिरेव शांतिः सा मा शान्तिरेधि
ओ३म् शांतिः शांतिः शांतिः||

अर्थ

शांति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में |
जल में, थल में और गगन में, अंतरिक्ष में और अग्नि, पवन में |

औषध वनस्पति वन उपवन में, सकल विश्व में जड़ चेतन में |
शांति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में |

ब्राह्मण के उपदेश वचन में, क्षत्रिय के द्वारा हो रण में |
वैश्य जनों के होवे धन में और शुद्र के हो चरणन में |
शांति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में |

शांति राष्ट्र निर्माण सृजन में, नगर-ग्राम में और भवन में |
जीव मात्र के तन में मन में और जगती के हो कण कण में |

शांति कीजिये प्रभु त्रिभुवन में |
शांति कीजिये प्रभु

#जयपरमपितापरमेश्वर ओ३म्
#ॐसच्चिदानंदपरमात्मने_नमः
स्रोत।    -  वेद।
लेखक   -  महर्षि दयानन्द स्वामी।
प्रस्तुति  - *वेद वरदान आर्य
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