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उस में मण्डूकों की आवाज का वर्णन अत्यन्त हृदयग्राही हुआ है

 मण्डूकी अथर्व ४/१५ का विषय वर्षा ऋतु है । उस में मण्डूकों की आवाज का वर्णन अत्यन्त हृदयग्राही हुआ है । इस पर निम्नलिखित इतिहास गढ़ा गया है-- वसिष्ठो वर्षकाम: पर्जन्यं तुष्टाव । तं मण्डूका अन्वमोदन्त । स मण्डूकान् अनुमोदमानान् दृष्ट्वा तुष्टाव । तदभिवादिन्येषर्ग् भवति -- उपप्रवद मण्डूकि वर्षमा वद तादुरि । मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुर: पद: ।।१४।।                             अथर्व:४/१५/१४ वसिष्ठ ने वर्षा की इच्छा से बादल की स्तुति की मेंढकों ने उसका अनुमोदन किया । अनुमोदन करते हुए मेंढकों को देखकर उसने उनकी भी स्तुति कर दी । इस वृत्तान्त को यह ऋचा कह रही है--    ऐ मण्डूकि ! उठ, ऊंची बोल । ऐ टर्राने वाली ! वर्षा का समाचार ला । चारों पैरों को उठाकर तालाब के बीच में तैर ।                  इस मन्त्र में मण्डूकी नाम से संसार-सरोवर में डूबी हुई बुद्धि को सम्बोधित किया गया है । मण्डूक का अर्थ यास्क ने मज्जूक=डूबा हुआ या मन्दूक= मस्त किया है ।उसे जग जाने, प्रभु-प...

दूसरों को बार-बार गलती करने का अवसर न देवें।

   दूसरों को बार-बार गलती करने का अवसर न देवें। इसमें आपकी बुद्धिमत्ता नहीं मानी जाएगी।        हमें प्रतिदिन अनेक लोगों के साथ व्यवहार करना पड़ता है। किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं है, कि यह व्यक्ति ईमानदार है या धोखेबाज है। धीरे-धीरे अनुभव से ही समझ में आता है, कि कौन ईमानदार है, और कौन धोखेबाज है!        और यह सब व्यवहार में परीक्षण करने से ही पता चलता है। यह परीक्षण करना आवश्यक भी है। यदि आप अपने आसपास के लोगों का परीक्षण नहीं करते, उनसे सावधान नहीं रहते, तो ऐसे लोग आपको निश्चित रूप से हानि पहुंचाएंगे। बार-बार आपको धोखा देंगे, और लूटेंगे।        सब लोग इतने ईमानदार नहीं हैं, इतने सीधे सच्चे नहीं हैं, जितना आप उनको समझते हैं। बल्कि अनुभव तो यही बताता है कि, संसार में अधिकतर लोग बेईमान हैं। अवसर की तलाश में रहते हैं। अवसर मिलते ही घोटाला करते हैं। आपको मेरी बात पर विश्वास न होता हो, और आपको परीक्षण करना हो, तो आप कर भी सकते हैं। सड़क पर ₹ 500 का एक नोट गिरा दीजिए और छुप कर देखिए, क्या होता है ? जिसकी भी नजर  पहले...

यदि परोपकार करने की आपकी इच्छा हो, तो परोपकार

  यदि परोपकार करने की आपकी इच्छा हो, तो परोपकार करने से पहले स्वयं अपनी योग्यता बनाएं, और फिर स्वयं परोपकार करें। दूसरे योग्य व्यक्तियों को परोपकार करने का आदेश/उपदेश न देवें। यह असभ्यता है।         बहुत से लोगों में पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार होते हैं। उन संस्कारों के कारण, उनमें सेवा परोपकार की भावना उत्पन्न होती है। यह अच्छी बात है। परंतु उन भावनाओं पर वे भावुक लोग नियंत्रण नहीं रख पाते। और यह चाहते हैं, कि जल्दी से जल्दी इस संसार का सुधार हो जाए। फटाफट लोग सुधर जाएं। अंधविश्वास पाखंड अन्याय शोषण चोरी डकैती लूट मार अत्याचार स्मगलिंग आदि सब बुरे काम जल्दी से बंद हो जाएं। 8109070419         परंतु केवल ऐसी भावनाएं रखने से या ऐसी इच्छाएँ रखने से ये सब बुरे काम बंद नहीं होते।  इसके लिए व्यक्ति को बहुत  पुरुषार्थ करना पड़ता है। बहुत सी कलाएं सीखनी पड़ती हैं। बहुत से शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ता है। बहुत सी विद्वता प्राप्त करनी पड़ती है। बहुत सा तर्क वितर्क भी सीखना पड़ता है। ऊंचे पद और अधिकार प्राप्त करने पड़ते हैं। तब जाकर कुछ पर...

भाषाशिक्षण के चार चरण ————————-

   भाषाशिक्षण के चार चरण ————————- विचार-विनिमय का उत्तम  माध्यम होती है भाषा । सम्बन्धों को सुदृढ़ करने का सर्वोत्तम साधन भाषा ।। भाषा कभी नहीं होती है निजी सम्पदा जग में। यह सम्पत्ति समाज की है हम समाज से लेते ऋण में ।। भाषाशिक्षण कैसे होता है ? करें आज इस पर विचार । सुनना, बोलना,लिखना,पढ़ना  भाषाशिक्षण के चरण चार।। इन चारों चरणों पर करते  हैं क्रमश:सोदाहरण विचार। “श्रवण” अर्थात् ठीक से सुनना भाषाशिक्षण का प्रथम चरण  ।। उच्चरित शब्द को बडे ध्यान से कान लगाकर करें श्रवण । वक्ता ने कहा “दागो” तो फिर दागो को “ दागो “ ही सुनना है।। सुना अगर “दागो” को “भागो”  तो अर्थ का अनर्थ ही हो जाना है । शिक्षण का द्वितीय चरण है भाषण जिसका अर्थ है शुद्ध उच्चारण ।। शुद्ध सुनें, फिर शब्द शुद्ध ही बोलें। “शंकर”को “शंकर” ही बोलें “संकर” कभी नहीं बोलें ।।” वन को बन,भाषा को भासा जोशी को जोसी कभी नहीं बोलें। शिक्षण का तृतीय चरण है लेखन लेखन सदा शुद्ध हो,ध्यान रखें।। मात्रादोष नहीं हो,सतर्क रहें। “ठीक” शब्द को ठीक लिखें।। “ठिक” नहीं भूलकर भी लिखें “ठिक” लिखा एक शिक्षक ने । मै...

एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे।

 एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी? सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे। दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी? तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है। एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है। इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने ...

ईश्वर हमारा माता, पिता और आचार्य भी है”

 ईश्वर हमारा माता, पिता और आचार्य भी है” =========== ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय एवं सृष्टिकर्ता है। वह जीवात्माओं के जन्म-जन्मान्तर के कर्मों के अनुसार न्याय करते हुए उन्हें भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म देकर उनको सुख व दुःख रूपी भोग व फल प्रदान करता है। संसार में असंख्य प्राणी योनियां देखने को मिलती है। इन सभी योनियों में मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जो उभय योनि कहलाती है। यह कर्म करने की और भोग योनि होने से उभय योनि कहलाती है। मनुष्येतर अन्य सभी योनियां केवल भोग योनियां होती हैं। भोग योनियों में हम अपने पूर्वजन्मों में मनुष्य योनियों में किये हुए पाप कर्मों का फल भोगते हैं और मनुष्य योनि में हमें अपने पूर्वजन्मों के पाप व पुण्य कर्मों का भोग प्राप्त होता है। मनुष्य योनि में पूर्व कर्मों के फलों का भोग करने के साथ हम नये कर्मों को भी करते हैं जिससे हमारी आत्मा सहित शरीर की उन्नति होती है। आत्मा की उन्नति होने पर मनुष्य पुण्य कर्मों को करता है ...

आज का संकल्प पाठ -- (सृष्टि संवत् - संवत्सर-अयन - ऋतु- मास-तिथि- नक्षत्र)

  ओ३म् सादर नमस्ते जी  आपका दिन शुभ हो  दिनांक  - -२८ सितम्बर २०२० दिन  - - सोमवार   तिथि  - -  द्वादशी   नक्षत्र - - धनिष्ठा   पक्ष  - - शुक्ल  माह  - - आश्विन ( द्वितीया) ऋतु  - - शरद्   सूर्य  - - दक्षिणायन  सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२१ कलयुगाब्द  - - ५१२१ विक्रम संवत्  - - २०७७ शक संवत्  - - १९४२    🔥ओ३म्....!                 🌷अनुपम उपदेश रत्नावली🌷      मूल्य का विचार मत करो―दो वस्तुओं के अधिक मूल्य का विचार मत करो। (१) पुस्तक यदि मनपसन्द हो (२) औषध यदि फायदेमन्द हो।     - एकान्तवास―एकान्तवास से तीन लाभ प्राप्त होते हैं।(१) स्वास्थय की वृद्धि, (२) आत्मिक शक्ति (३) धर्म की वृद्धि।      चोरी―चोर केवल वही मनुष्य नहीं जो किसी की वस्तु को चुराता है अपितु वह भी है जो झूठ बोलता है क्योंकि वह जानी वा समझी बात को छिपाता है।     भक्त―भक्त केवल वही नहीं जो दिन रात ईश्वर की भक्ति करे अप...