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दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों

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 मुझे भी सौभाग्य मिला था  इनके दर्शन का - "दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की प्रमुख सहयोगी थी। 18 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्हीं दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गा भाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थी।"        "महान क्रांतिकारी "दुर्गा भाभी" को उनकी जन्मतिथि 7 अक्टूबर पर "आर्य परिवार संस्था, कोटा" की ओर से हार्दिक शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।"                 दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) का जन्म 7 अक्टूबर 1902 को शहजादपुर ग्राम अब कौशाम्बी जिला में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं॰ शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे जिन्होंने बचपन से ही दुर्गा भाभी के सभी बातों को पूर्ण करते थे।        दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊ...

महान क्रांतिकारी "दुर्गा भाभी

 मुझे भी सौभाग्य मिला था  इनके दर्शन का - "दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की प्रमुख सहयोगी थी। 18 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्हीं दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गा भाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थी।"      "महान क्रांतिकारी "दुर्गा भाभी" को उनकी जन्मतिथि 7 अक्टूबर पर "आर्य परिवार संस्था, कोटा" की ओर से हार्दिक शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।"               दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) का जन्म 7 अक्टूबर 1902 को शहजादपुर ग्राम अब कौशाम्बी जिला में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं॰ शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे जिन्होंने बचपन से ही दुर्गा भाभी के सभी बातों को पूर्ण करते थे।        दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। ...

वेदों के पुनर्स्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी

  वेदों के पुनर्स्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी  महर्षि दयानन्द सरस्वती का नाम राष्ट्र निर्माताओं में सदैव आदरपूर्वक लिया जाएगा। उन्होंने आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में जागृति का शंखनाद तो फूँका ही था, उन्होंने देशवासियों को स्वराज्य के महत्व से भी अवगत कराया था। उस समय की राजनैतिक दासता की स्थिति के कारण उनका हृदय विह्वल था। उन्होंने अपने अमर ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में लिखा है- ‘‘अब अभाग्योदय से और आर्यों के आलस्य, प्रमाद, परस्पर विरोध से अन्य देशों के राज्य करने की तो कथा ही क्या कहनी, किन्तु आर्यावर्त में भी आर्यों का अखण्ड, स्वतन्त्र, स्वाधीन, निर्भय राज्य इस समय नहीं है। जो कुछ भी है सो भी विदेशियों से पादाक्रान्त हो रहा है। दुर्दिन जब आता है, तब देशवासियों को अनेक प्रकार का दुःख भोगना पड़ता है। कोई कितना भी करे, परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है, सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मतमतान्तर के आग्रह रहित, माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परन्तु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा अलग-अलग व्यवहार ...

aaj ka mantra

  ओ३म् विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्नि: स्वस्तये।  देवा अवन्त्वृभव: स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्र: पात्वंहस: ( ऋग्वेद ५|५१|१३ ) अर्थ  :- आज सब विद्वान लोग हमारे कल्याण के लिए हो। सब मनुष्यों में वर्तमान सर्वव्यापक ज्ञान-स्वरूप परमात्मा हमारा कल्याण करे। दुष्टों को दण्ड देने वाला प्रभु  ! हमें पापों से सदा दूर रखें ताकि हमारा सदा कल्याण हो। Intercast Marriage ,The Vivah Sanskar will be solemnised,16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777

ज्ञानी और विद्यावान हो

 कोई कितना ही ज्ञानी और विद्यावान हो , यदि वह अपने आचरण में विद्या और ज्ञान का उपयोग नही करता तो वह मूर्ख ही नही महामूर्ख हैं। वह उस जानवर की तरह है जिस पर बहुत सी किताबें लदी होती है पर वह उन पुस्तकों के ज्ञान से लाभ नही उठा पाता। जैसे तपेली और कलछी को स्वादिष्ट व्यंजन के स्वाद का आनन्द नही मिलता। 

ऋषि दयानन्द ने सत्य के निर्णयार्थ सब धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ किये थे

  ओ३म् “ऋषि दयानन्द ने सत्य के निर्णयार्थ सब धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ किये थे” =========== सभी मनुष्य बुद्धि रखते हैं जो ज्ञान प्राप्ति में सहायक होने के साथ सत्य व असत्य का निर्णय कराने में भी सहायक होती है। एक ही विषय में अनेक मनुष्यों व आचार्यों के विचार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यह भी सत्य एवं प्रामणिक तथ्य है कि एक विषय में सत्य एक ही होता है। गणित में दो व दो चार होते हैं। कोई गणित का विद्वान व आचार्य इससे भिन्न मान्यता वाला नहीं होता है। इसी प्रकार से धर्म विषय में मुख्यतः ईश्वर के स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव, आत्मा के स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव तथा उपासना की विधि आदि विषयों की चर्चा करके एक सत्य सिद्धान्त स्थापित किया जा सकता है व करना भी चाहिये। वर्तमान में व महाभारत के बाद से इन विषयों में एक मत न होकर अनेक आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत व विचार रहे हैं। महाभारत के बाद स्वामी आदि शंकराचार्य जी ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने जैन मत के आचार्यों से ईश्वर के अस्तित्व पर शास्त्रार्थ किया था और शास्त्रार्थ में जो निष्कर्ष व तथ्य सामने आये थे, वह स्वामी शंकराचार्य जी का अद्वैत मत था जिसे ...

मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है

ओ३म् “मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है” ==========https://youtu.be/s_rCeN2lLqc हमें ज्ञात है व ज्ञात होना चाहिये कि संसार में तीन अनादि व नित्य पदार्थों का अस्तित्व है। यह तीन पदार्थ ईश्वर, जीव व प्रकृति हैं। ईश्वर व जीव सत्य एवं चेतन पदार्थ हैं। ईश्वर स्वभाव से आनन्द से युक्त होने से आनन्दस्वरूप है तथा जीव आनन्द व सुख से युक्त न होने के कारण आनन्द व सुख प्राप्ति की चेष्टा करता है। ईश्वर जीव को सुख व आनन्द देने में सहायक होता है। जीवों को सुख आदि देने के लिये ही ईश्वर इस सृष्टि को रचा है व वही इसका पालन करता है जिससे सभी जीवों को उनके जन्म-जन्मान्तरों के सभी शुभ व अशुभ कर्मों का यथायोग्य सुख व दुःखी कर्मों फल प्राप्त हो सके। परमात्मा ने इस सृष्टि वा ब्रह्माण्ड को प्रकृति नामी अनादि पदार्थ से बनाया है। यदि यह तीन अनादि व नित्य पदार्थ न होते तो हम भी न होते, न ही ईश्वर होता और न ही यह संसार व ब्रह्माण्ड होता। इस ब्रह्माण्ड में ईश्वर एक मात्र सत्ता है। संसार में दूसरा व तीसरा कोई ईश्वर व इसके समान सत्ता नहीं है। जीवात्मायें सब एक समान हैं जो अपने पूर्वजन्...

स्वामी दयानंद के सत्य व अहिंसा के प्रयोग

  ओउम्      स्वामी दयानंद के सत्य व अहिंसा के प्रयोग                                      डा. अशोक आर्य  https://youtu.be/lfI1oA6TmAo                        भारतीय तथा पाश्चात्य महापुरुषों में एक मूलभूत अंतर रहा है| भारतीय महापुरुषों ने अपने जीवन की उन महत्वपूर्ण घटनाओं को सदा ही छुपाने का यत्न किया है| यहाँ तक कि अपनी जन्म तिथि तक इतिहास को नहीं बताई ताकि उनके जन्मदिन के नाम से कहीं भारतीय जन मानस उनका स्तुतिगान आरम्भ न कर दे| दूसरी और जब हम पश्चिमी महापुरुषों के जीवनों पर दृष्टि डालते हैं, तो हम पाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन की छोटी छोटी घटनाओं (जिनसे किसी को कुछ भी प्रेरणा मिलती हो) को संजो कर रखा है| वह चाहते थे कि उनका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जावे, जबकि भारतीयों ने सदा वेद,उपनिषद्, दर्शन तथा ब्राहमण ग्रन्थों को ही प्रेरणा का स्रोत माना| इस कारण अपने जीवनों को तथा इस की छोटी बड़ी घटनाओं को त...

श्वर संबंधित मुख्य जानकारियां

 श्वर संबंधित मुख्य   जानकारियां:------- ( क ) ईश्वर के गुण - १.सच्चिदानंदस्वरुप, २. निराकार ३.सर्वशक्तिमान, ४. न्यायकारी ,५. दयालु ६.अजन्मा  ७.अनन्त | ईश्वर का मुख्य नाम ओ३म् है, ईश्वर के अन्य गुणवाचक नाम भी हैं, ईश्वर ;--------- सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टि-कर्ता, सृष्टिहर्ता और मोक्ष दाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, महादेव, विराट, अग्नि, विश्व, हिरण्यगर्भ, वायु, तैजस, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ, परम पुरुष, मनु, प्रजापति, इन्द्र, प्राण, ब्रह्म, रूद्र, कालाग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गुरुत्मान्, मातरिश्वा, भूमि, आदि सब उसी एक ही ईश्वर के नाम हैं ) ( ख ) -ईश्वर के कार्य - १. ईश्वर सृष्टि की रचना करते हैं। २. ईश्वर सृष्टि का पालन करते हैं| ३. ईश्वर सृष्टि का संहार करते हैं ४. ईश्वर वेदों का ज्ञान देते हैं। ५. ईश्वर अच्छे-बुरे कर्मों का फल देते हैं | ६. ईश्वर योगियों को मोक्ष प्रदान करते हैं | ( ग )  ईश्वर के उपदेश -...

उस में मण्डूकों की आवाज का वर्णन अत्यन्त हृदयग्राही हुआ है

 मण्डूकी अथर्व ४/१५ का विषय वर्षा ऋतु है । उस में मण्डूकों की आवाज का वर्णन अत्यन्त हृदयग्राही हुआ है । इस पर निम्नलिखित इतिहास गढ़ा गया है-- वसिष्ठो वर्षकाम: पर्जन्यं तुष्टाव । तं मण्डूका अन्वमोदन्त । स मण्डूकान् अनुमोदमानान् दृष्ट्वा तुष्टाव । तदभिवादिन्येषर्ग् भवति -- उपप्रवद मण्डूकि वर्षमा वद तादुरि । मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुर: पद: ।।१४।।                             अथर्व:४/१५/१४ वसिष्ठ ने वर्षा की इच्छा से बादल की स्तुति की मेंढकों ने उसका अनुमोदन किया । अनुमोदन करते हुए मेंढकों को देखकर उसने उनकी भी स्तुति कर दी । इस वृत्तान्त को यह ऋचा कह रही है--    ऐ मण्डूकि ! उठ, ऊंची बोल । ऐ टर्राने वाली ! वर्षा का समाचार ला । चारों पैरों को उठाकर तालाब के बीच में तैर ।                  इस मन्त्र में मण्डूकी नाम से संसार-सरोवर में डूबी हुई बुद्धि को सम्बोधित किया गया है । मण्डूक का अर्थ यास्क ने मज्जूक=डूबा हुआ या मन्दूक= मस्त किया है ।उसे जग जाने, प्रभु-प...

दूसरों को बार-बार गलती करने का अवसर न देवें।

   दूसरों को बार-बार गलती करने का अवसर न देवें। इसमें आपकी बुद्धिमत्ता नहीं मानी जाएगी।        हमें प्रतिदिन अनेक लोगों के साथ व्यवहार करना पड़ता है। किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं है, कि यह व्यक्ति ईमानदार है या धोखेबाज है। धीरे-धीरे अनुभव से ही समझ में आता है, कि कौन ईमानदार है, और कौन धोखेबाज है!        और यह सब व्यवहार में परीक्षण करने से ही पता चलता है। यह परीक्षण करना आवश्यक भी है। यदि आप अपने आसपास के लोगों का परीक्षण नहीं करते, उनसे सावधान नहीं रहते, तो ऐसे लोग आपको निश्चित रूप से हानि पहुंचाएंगे। बार-बार आपको धोखा देंगे, और लूटेंगे।        सब लोग इतने ईमानदार नहीं हैं, इतने सीधे सच्चे नहीं हैं, जितना आप उनको समझते हैं। बल्कि अनुभव तो यही बताता है कि, संसार में अधिकतर लोग बेईमान हैं। अवसर की तलाश में रहते हैं। अवसर मिलते ही घोटाला करते हैं। आपको मेरी बात पर विश्वास न होता हो, और आपको परीक्षण करना हो, तो आप कर भी सकते हैं। सड़क पर ₹ 500 का एक नोट गिरा दीजिए और छुप कर देखिए, क्या होता है ? जिसकी भी नजर  पहले...

यदि परोपकार करने की आपकी इच्छा हो, तो परोपकार

  यदि परोपकार करने की आपकी इच्छा हो, तो परोपकार करने से पहले स्वयं अपनी योग्यता बनाएं, और फिर स्वयं परोपकार करें। दूसरे योग्य व्यक्तियों को परोपकार करने का आदेश/उपदेश न देवें। यह असभ्यता है।         बहुत से लोगों में पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार होते हैं। उन संस्कारों के कारण, उनमें सेवा परोपकार की भावना उत्पन्न होती है। यह अच्छी बात है। परंतु उन भावनाओं पर वे भावुक लोग नियंत्रण नहीं रख पाते। और यह चाहते हैं, कि जल्दी से जल्दी इस संसार का सुधार हो जाए। फटाफट लोग सुधर जाएं। अंधविश्वास पाखंड अन्याय शोषण चोरी डकैती लूट मार अत्याचार स्मगलिंग आदि सब बुरे काम जल्दी से बंद हो जाएं। 8109070419         परंतु केवल ऐसी भावनाएं रखने से या ऐसी इच्छाएँ रखने से ये सब बुरे काम बंद नहीं होते।  इसके लिए व्यक्ति को बहुत  पुरुषार्थ करना पड़ता है। बहुत सी कलाएं सीखनी पड़ती हैं। बहुत से शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ता है। बहुत सी विद्वता प्राप्त करनी पड़ती है। बहुत सा तर्क वितर्क भी सीखना पड़ता है। ऊंचे पद और अधिकार प्राप्त करने पड़ते हैं। तब जाकर कुछ पर...

भाषाशिक्षण के चार चरण ————————-

   भाषाशिक्षण के चार चरण ————————- विचार-विनिमय का उत्तम  माध्यम होती है भाषा । सम्बन्धों को सुदृढ़ करने का सर्वोत्तम साधन भाषा ।। भाषा कभी नहीं होती है निजी सम्पदा जग में। यह सम्पत्ति समाज की है हम समाज से लेते ऋण में ।। भाषाशिक्षण कैसे होता है ? करें आज इस पर विचार । सुनना, बोलना,लिखना,पढ़ना  भाषाशिक्षण के चरण चार।। इन चारों चरणों पर करते  हैं क्रमश:सोदाहरण विचार। “श्रवण” अर्थात् ठीक से सुनना भाषाशिक्षण का प्रथम चरण  ।। उच्चरित शब्द को बडे ध्यान से कान लगाकर करें श्रवण । वक्ता ने कहा “दागो” तो फिर दागो को “ दागो “ ही सुनना है।। सुना अगर “दागो” को “भागो”  तो अर्थ का अनर्थ ही हो जाना है । शिक्षण का द्वितीय चरण है भाषण जिसका अर्थ है शुद्ध उच्चारण ।। शुद्ध सुनें, फिर शब्द शुद्ध ही बोलें। “शंकर”को “शंकर” ही बोलें “संकर” कभी नहीं बोलें ।।” वन को बन,भाषा को भासा जोशी को जोसी कभी नहीं बोलें। शिक्षण का तृतीय चरण है लेखन लेखन सदा शुद्ध हो,ध्यान रखें।। मात्रादोष नहीं हो,सतर्क रहें। “ठीक” शब्द को ठीक लिखें।। “ठिक” नहीं भूलकर भी लिखें “ठिक” लिखा एक शिक्षक ने । मै...

एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे।

 एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी? सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे। दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी? तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है। एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है। इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने ...

ईश्वर हमारा माता, पिता और आचार्य भी है”

 ईश्वर हमारा माता, पिता और आचार्य भी है” =========== ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय एवं सृष्टिकर्ता है। वह जीवात्माओं के जन्म-जन्मान्तर के कर्मों के अनुसार न्याय करते हुए उन्हें भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म देकर उनको सुख व दुःख रूपी भोग व फल प्रदान करता है। संसार में असंख्य प्राणी योनियां देखने को मिलती है। इन सभी योनियों में मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जो उभय योनि कहलाती है। यह कर्म करने की और भोग योनि होने से उभय योनि कहलाती है। मनुष्येतर अन्य सभी योनियां केवल भोग योनियां होती हैं। भोग योनियों में हम अपने पूर्वजन्मों में मनुष्य योनियों में किये हुए पाप कर्मों का फल भोगते हैं और मनुष्य योनि में हमें अपने पूर्वजन्मों के पाप व पुण्य कर्मों का भोग प्राप्त होता है। मनुष्य योनि में पूर्व कर्मों के फलों का भोग करने के साथ हम नये कर्मों को भी करते हैं जिससे हमारी आत्मा सहित शरीर की उन्नति होती है। आत्मा की उन्नति होने पर मनुष्य पुण्य कर्मों को करता है ...

आज का संकल्प पाठ -- (सृष्टि संवत् - संवत्सर-अयन - ऋतु- मास-तिथि- नक्षत्र)

  ओ३म् सादर नमस्ते जी  आपका दिन शुभ हो  दिनांक  - -२८ सितम्बर २०२० दिन  - - सोमवार   तिथि  - -  द्वादशी   नक्षत्र - - धनिष्ठा   पक्ष  - - शुक्ल  माह  - - आश्विन ( द्वितीया) ऋतु  - - शरद्   सूर्य  - - दक्षिणायन  सृष्टि संवत्  - - १,९६,०८,५३,१२१ कलयुगाब्द  - - ५१२१ विक्रम संवत्  - - २०७७ शक संवत्  - - १९४२    🔥ओ३म्....!                 🌷अनुपम उपदेश रत्नावली🌷      मूल्य का विचार मत करो―दो वस्तुओं के अधिक मूल्य का विचार मत करो। (१) पुस्तक यदि मनपसन्द हो (२) औषध यदि फायदेमन्द हो।     - एकान्तवास―एकान्तवास से तीन लाभ प्राप्त होते हैं।(१) स्वास्थय की वृद्धि, (२) आत्मिक शक्ति (३) धर्म की वृद्धि।      चोरी―चोर केवल वही मनुष्य नहीं जो किसी की वस्तु को चुराता है अपितु वह भी है जो झूठ बोलता है क्योंकि वह जानी वा समझी बात को छिपाता है।     भक्त―भक्त केवल वही नहीं जो दिन रात ईश्वर की भक्ति करे अप...

हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया।

  बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया। कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है.... मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....! • अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है। • जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था। अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्ष पर्यन्त राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ? अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्ष तक टिका रहा। हीरे माणिक्य की हम्पी नगर में मण्डियां लगती थीं।महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं न...